गुरुवार, 18 अगस्त 2011

बेवफाई मुझसे होती नहीँ वफा मुझे मिलती नहीँ...

किसी ने जुदाई लिखी तो किसी ने दुहाई दी मोहबत मेँ...,
हमने ना चाहत देखी ना देखी रुसवाई मोहबत मेँ...,
लोगोँ को देखा खेलते जजबातोँ के संग ईशक के नुमाईश मेँ...,
छुपाते हैँ दिखातेँ हैँ ना जाने कया मिले इनहेँ खुद को आजमाने मेँ...,
मेरे संग मेरा भ्रम टुट गया कया खता कया सजा है इस जमाने मेँ...,
कोई खेले दिलोँ का खेल कोई खेले यहाँ अपनोँ से...,
रिशतोँ मेँ बँधा विशवास ना रहा जमानेँ मेँ...,
कोई हँसता है जमानेँ मेँ तो कोई रोता है इनहेँ भुलाने मेँ...,
ऐ खुदा तु बता कया सचाई है तेरी खुदाई मेँ...,
मैँ करुँ शिकवा तुझसे ऐसी नहीँ नीयत मेरी चाहे कितने भी मौसम लिखे तुने तनहाई के मेरी जिदगीँ मेँ...,
हमने भी सीखी सुरज से खुद को जलाना और चाँद सी नरमी अपनी जिदगीँ की परछाईँ मेँ...,
नैना गमगीन रह भी जाये तो कया ना होगी कभी बेवफाई मुझसे जिदगीँ मेँ...