रविवार, 9 फ़रवरी 2014

MUSKIL

मुस्किले कम  होती नहीं जिंदगी यहाँ थमती नहीं ,कुछ पल मिले जो मोहब्बत  के  उन्हें भूलना मुमकिन नहीं 
कैसे समझाऊँ दर्द में भी वो राहत  देते नहीं 
अजीब है ये सिलसिला कुछ सूझता नहीं तो कुछ  सुलझता नहीं 
मिले जो तन्हाइयां तो  सवालों में घिरी रही 
अनजान है रास्ते कोई  अपनी यहाँ पहचान नहीं 
ढूंढ़ती रही हूँ दरबदर अपने ही साये जिन्हे छोड़ आई थी कहीं 
खुशी रही इसकदर जैसे रेगिस्तान में हुई बारिश कभी 
तंग आ गई अपने ही ख़वाबों से जो हुए पुरे नहीं 
टुटा है वो महल जिसे अरमान था चाहत के रंगो से सजाने का 
क्यों कोई समझता नहीं जो  हमारा है वो किसी और का हो सकता नहीं