रविवार, 25 जनवरी 2015

आजकल

कुछ कहने के लिये आजकल लफ्ज नहीं मिलते..
कुछ मिलके भी हमसे यहां रोज बिछडते..
तन्हाइयो मे यादो के मेले रोज ही लगते
कभी आन्शू छलकते तो कभी खामोशी बिखरते
अजीब है रीत दुनियावालो की जो आज है वो कल बन जाया करते..
मुस्किल यही कल मे ही हम सदिया बिताया करते..
आज जो है उसे खो क्युं हम दिया करते..