गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

कोशिश

तेरे लफ्ज कितने दर्द समेटे मुझे छू जाते है..
कभी तेरी खमोशी मे खुद को हम सुन पाते है..
दुआ अगर कुबुल होती तो हम तेरी खुशी मांगते है..
तेरी अधूरी मुह्बत की गुनहगारो मे हम  तुम्हे नजर आते है..
महफुज तुम्हे रखने की खातिर ही ये गुनाह हम रोज कर जाते है..
जब जब तेरे लफ्जो मे अपना नाम सुनते है
यकिन नही होता आज भी बारिश हमपे  बरसते है,
रुख्सत तुमसे मिलती क्यू नही हर रात सवालो मे गुजारा करते है..
तुमसे मिलके खुद को पाये थे कभी आज खुद को खोया पाया करते है..
जब भी तुम्हे देखती हू हम सवर जाया करते है..
कैसा है एहसास तुमसे मिलके  तो हम तुमको भी भुल जाया करते है..
कोशिश रोज हम खुद को मिटाने की किया करते है..
तुम्हे देखते ही फिर इक नयी जिन्द्गी हम जी लेते है..

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

अधूरी कहानी

मेरी कहानी कभी पूरी होती नही  अधूरी की अधूरी ही रही..
कोशिशे बहुत की हमने शायद लिखनेवाले ने भी अधूरी ही छोरी..
कभी स्याहि खत्म हुई तो कभी रोशनी की लौ कम रही..
कभी लिखते लिखते कागज ही गीली हो गयी..
फैले थे जितने अन्धेरे उतनी ही स्याहि फैल गयी..
लफ्ज जो लिखी थी धुन्ध्ली सी उनमे ही कहीं छुप गयी..
हर बार कोशिश मेरी नाकाम रही..
जब भी कलम उठाई कितने ही सवालो मे खुद घिर गयी..
एक से एक थे उलझन जितना सुल्झाई और उल्झती सी गयी..
मायुष दिल ने हार जैसे कुबुल कर ही ली..
जो खुद अधूरी हो  कैसे लिखे कोई कहानी पूरी..
खेल ही लिखनेवाले का सबकुछ दे के बस चाभि अपने पास ही रखी..
उसकी रजामन्दि न हो जबतक बारिश नैनो की थमती नही..
अब शिकवा नही बस कोशिशे अपनी जारी रहेगी ..
कभी तो पूरी होगी मेरी भी कहानी कभी..
रहम फरमाना तू भी उपरवाले वक्त निकाल के पूरी कर देना इस जहान के अधूरी कहानी सभी..
मै खुश रहूगी हुई जो कुबूल दुआ मेरी
चाहे रहे मेरी जिन्द्गी ही अधूरी..

बिते लम्हे दर्द देते रहे

भुला दी तुमने मेरे एहसास की हर वो दास्तां है..
आज कोई ग़म नही तुम्हे कभी छूता है..
मुझसे जुदा है तो हर लम्हा तेरा ही तेरा है..
तेरे लफ्जो मे अब और ही नाम सजा है..
मै मिट गयी इक तेरे ग़म मे और तू खुश हर लम्हा है..
सुन्सान राहों मे अब परछाइयां भी दिखती कहां है..
बस पतियों की छुपी सरसराहट ही देती सुनाइ यहां है..
तेरी मुस्कुराहट पे जो रंग नया है
आज महसूस हुआ हमने वो खोया था जो मेरा कहां है..
इक पल के लिये जिसे भूली नही वो मुझे भुला बैठा है..
यकिन नही सांसो का बंधन भी कितना झूठा है..
बिन तेरे टूटता नही और बोझ सी जिन्द्गी जी रहा है..
कितना लिखू दास्तान दर्द के अपने मुझे कोई अब पढनेवाला कहां है..
खतम हो चुकी जो कहानी उसकी परवाह किसे यहां है..
दिल धड़कना ही काश बंद कर देता जब इसका कोई खयाल करता ही कहां है..
मुझे मालूम नही जो है नही उसका जिक्र क्यू मेरे अल्फाजो मे हुआ है..
बस इतना मुझे पता कुछ तो टूटा इस कदर है जिसका दर्द हमे ज्यादा हुआ है..
तू खुश रहे मेरी दुआ लेकिन इक इल्त्जा दुर नजरो से भी तेरा रहना जरुरी सा लगा है..
तेरे अंदर अब वो जज्बात नही जिसे हमने अपना समझ लिया है..
अब तू किसी और का हिस्सा है बस मुझसे जुडा इक तेरी मुहबत का किस्सा है..
जिसे सदियो पहले हमने दफ़न कर दिया है..
तुझसे मिलके भी आज मुझे बस लगा तू इक बिता बस लम्हा है..
तुझसे जो भी जुडा है आज खतम हमने कर दिया है..

वजुद

मुझे बनानेवाले तेरी माया भी अजीब है
मुझसे ही लिखवा दी तूने मेरी बन्द्गी है
आज़ाद हू ,फ़िर भी कैद हू  , किसी के गुमनाम से आये शहर मे..
कभी लिखती हू ,अपनी बर्बादियों का  जो मंजर है..
तो कभी  आन्सूओ का , बहाना जो अपना मुक्द्दर है..
रेत है चारो ओर ,फैली बारिशो का न कोई नामोनिशा है..
चांद भी खामोश निहारता अब मेरी ओर है..
तप्ती धूप का भी शायद अब मुझपे ना होता कोई असर है..
नैनो की बारिशो से भिगी मेरी रुह है..
रब भी बनाइ क्या हमे चीज है..
जिद्द कुछ ऐसी है अगर तेरी खुदाइ इतनी सख्त है..
तो हम भी तैयार बैठे तेरे ही शहर मे आये बगावत के लिये मिजाज है..
सबकुछ भले हार गये हम तेरे आगे इरादे आज भी खुद के मजबुत है..
तेरे मिट्टी से बने है तो सख्त हम भी तेरे जैसे है..
हम जिस दिन मिट गये लिख ले तू भी तेरे वजुद भी मिट गये है..

Dard miT jaye aisi koi dawa nhi..

Dard miT jaye aisi koi dawa nhi...
Dard se bhari padi dastan e
jindgi apni...
Kuch pal bikhre nagmo ko humne saaj bana li ...
Jo lafz the khusiyo ke wo geet saje hotho pe nhi...
Milti rhi bahare ujde chaman me par koi phul yaha khila nhi...
Ek najar se dusri najar kvi mili nhi..
Jinhe socha nhi kvi maine wo nasib me apni likhi...
Khawab sanjoye chandni raton ke par wo chand kvi dikha hi
nhi...
Jise samjhi sitaro si mahfil wo bekhabr tanhai thi meri...
Gam ka sikwa kaise n kru jab hassi apne daman me nhi...
Mita de wo har afsane jis se nam rhi aankhe meri...
Dard n ho kvi aisi koi kya dawa
nhi...
Jo dard n de kvi jindgi me kya
aisa koi farista nhi....

Bojh

Har saans bojh ban gai hai kisi ke yadon ke bojh se..
ek pal sambhlti nhi mujhse kabhi tut kar  bikhrti tukdo me tut  tut ke..
aarju itni si ek pal mujhe bhi sukun mile kabhi inn bojh se..
kasmkash mein hu mai kya thi jindgi aur kahan aa pahunchi ek jara si shouk se..
murat bnane ki khawaish dil ki kya hui surat hi badal gai khawab ke..
khatam hota nhi jajbaton ka silsila kaise kahu dam n ghut jaye inke hi aagosh me..
tute huye tukdo ko samet ti rhi ajtak jinke  nasib me bikhrna hi the likhe..
bhut hai yahan bojh uthane agar ki jo chahat  jindgi me khusi pane ke..
girna aur fir girte girte ek din bikharna sayad likh di uparwale ne apne nasib me..

Raat ka Andhera

Raat ka andhera hai gum kahin wo roshan savera hai...
Aaj dil ne tanha koi dhun gugunaya hai...
Palko me nind nahi ayi aur aansu kyun chalka hai...
Hamne har roj chand ko humsafar mana hai...
Aaj wo v badlo me chup kr sath mera chora hai...
Main nhi gamgin par gam ka saya sang q chalta aya hai...
Ae khuda tu bata meri hisse ki khusiya tu kisse baant aya hai...
Marne ko maut nhi aur jindgi ko maut ki sej banaya hai...
Har pal tadpta koi kisike liye aurkoi bhul usse aya hai...
Ek gunah tu v kr le khuda ab rukhshat de hume jo jinda rhne ka faisla tumne mujhe sunaya hai..