सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

अधूरी कहानी

मेरी कहानी कभी पूरी होती नही  अधूरी की अधूरी ही रही..
कोशिशे बहुत की हमने शायद लिखनेवाले ने भी अधूरी ही छोरी..
कभी स्याहि खत्म हुई तो कभी रोशनी की लौ कम रही..
कभी लिखते लिखते कागज ही गीली हो गयी..
फैले थे जितने अन्धेरे उतनी ही स्याहि फैल गयी..
लफ्ज जो लिखी थी धुन्ध्ली सी उनमे ही कहीं छुप गयी..
हर बार कोशिश मेरी नाकाम रही..
जब भी कलम उठाई कितने ही सवालो मे खुद घिर गयी..
एक से एक थे उलझन जितना सुल्झाई और उल्झती सी गयी..
मायुष दिल ने हार जैसे कुबुल कर ही ली..
जो खुद अधूरी हो  कैसे लिखे कोई कहानी पूरी..
खेल ही लिखनेवाले का सबकुछ दे के बस चाभि अपने पास ही रखी..
उसकी रजामन्दि न हो जबतक बारिश नैनो की थमती नही..
अब शिकवा नही बस कोशिशे अपनी जारी रहेगी ..
कभी तो पूरी होगी मेरी भी कहानी कभी..
रहम फरमाना तू भी उपरवाले वक्त निकाल के पूरी कर देना इस जहान के अधूरी कहानी सभी..
मै खुश रहूगी हुई जो कुबूल दुआ मेरी
चाहे रहे मेरी जिन्द्गी ही अधूरी..

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