सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

वजुद

मुझे बनानेवाले तेरी माया भी अजीब है
मुझसे ही लिखवा दी तूने मेरी बन्द्गी है
आज़ाद हू ,फ़िर भी कैद हू  , किसी के गुमनाम से आये शहर मे..
कभी लिखती हू ,अपनी बर्बादियों का  जो मंजर है..
तो कभी  आन्सूओ का , बहाना जो अपना मुक्द्दर है..
रेत है चारो ओर ,फैली बारिशो का न कोई नामोनिशा है..
चांद भी खामोश निहारता अब मेरी ओर है..
तप्ती धूप का भी शायद अब मुझपे ना होता कोई असर है..
नैनो की बारिशो से भिगी मेरी रुह है..
रब भी बनाइ क्या हमे चीज है..
जिद्द कुछ ऐसी है अगर तेरी खुदाइ इतनी सख्त है..
तो हम भी तैयार बैठे तेरे ही शहर मे आये बगावत के लिये मिजाज है..
सबकुछ भले हार गये हम तेरे आगे इरादे आज भी खुद के मजबुत है..
तेरे मिट्टी से बने है तो सख्त हम भी तेरे जैसे है..
हम जिस दिन मिट गये लिख ले तू भी तेरे वजुद भी मिट गये है..

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