गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

कोशिश

तेरे लफ्ज कितने दर्द समेटे मुझे छू जाते है..
कभी तेरी खमोशी मे खुद को हम सुन पाते है..
दुआ अगर कुबुल होती तो हम तेरी खुशी मांगते है..
तेरी अधूरी मुह्बत की गुनहगारो मे हम  तुम्हे नजर आते है..
महफुज तुम्हे रखने की खातिर ही ये गुनाह हम रोज कर जाते है..
जब जब तेरे लफ्जो मे अपना नाम सुनते है
यकिन नही होता आज भी बारिश हमपे  बरसते है,
रुख्सत तुमसे मिलती क्यू नही हर रात सवालो मे गुजारा करते है..
तुमसे मिलके खुद को पाये थे कभी आज खुद को खोया पाया करते है..
जब भी तुम्हे देखती हू हम सवर जाया करते है..
कैसा है एहसास तुमसे मिलके  तो हम तुमको भी भुल जाया करते है..
कोशिश रोज हम खुद को मिटाने की किया करते है..
तुम्हे देखते ही फिर इक नयी जिन्द्गी हम जी लेते है..

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें