लिखती रही तेरे ही चर्चे अपनी कहानियों मे…
ढूढती रही खुद को तेरी ही परछाइयों मे…
कुछ अनकही बातो का बोझ लिये दिल मे…
कुछ तेरे मेरे सपने…
जो टूट गये कुछ जो जुडे थे संग अपने…
दर बदर भटके ना जाने कितने दर पे…
सुकुन आता नही जो इस बेचैनि से छूटकारा मिले..…
भूलना चाहती खुद को भी अब क्या रहा अपना जिसका सहारा रहे…
मन की मर्जियो मे तबाह सारी उमर हम रहे…
जो बित गये जो छुट गये हम ही क्यू तबाह उनके पीछे होते रहे…
आज़ाद हू दिल से जिनके उनके खवाब क्यू गुलाम बना रखे…
तकदिरो मे जब जुदाइ लिखी क्यू हम मिलने की कोशिशे करते रहे…
तेरे बाद बस इतनी इल्तेजा हम पतथर बनके यहा रहे…
ना सुने ना कहे ना एहसास कोई हमे छू भी ना सके…
मिट ना जाये वजुद जब्तक बस दुर मुझसे जुडा मेरा हर किस्सा रहे…
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें