गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

घर

तिनका तिनका लाके कभी था घर हमने भी बनाया
इक हवा के जोर से थोडा दिल था घबराया
फ़िर भी दिल को एतेबार था संग सदा रहेगा अपनो का हमपे साया
मौसम की खुमारी क्या बदली बिखरा हुआ जरा जरा हमने पाया
कुछ थे इतने टूटे की हाथो से हमने समेट नही पाया
दर्द भी थे इतने की अश्को से ही हमने कुछ बहा डाला
आशिया बनाते बनाते हमने खुद को बेघर बना डाला
दीवारो सी उंची अमानते थी वो भी हमने चंद लम्हो मे गवाया
आज खाक होके खुद को राख सा हमने पाया
सुलग रहा किस चिंगारी से धुआ धुआ मिलो फैला हमने पाया
कब्तलक बुझेगी ये आग जिसमे जला मेरा जाहां

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