गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

नफरतो के मौसम

बहुत देखे हम तुम संग मौसम दोस्ती के
इक इक पल मे थे कभी सदिया जीते
तेरे आते ही लब भी बोल पडते थे
गुनगुनाते थे हर मौसम रंग लिये चाहतो के
फूलो सी महक थी अपनी हसि ठ्हाको की बाग मे जब गुंजा करते थे
नाजुक थी फूलो सी इतनी जब गिला इक दूसरे का करते थे
टूट जाती थी मनमानी हम अपनी जब करते थे
मौसम बदलते ही बर्फ सी पिघला करते थे
जिद मे अपने ना जाने कितना हम तड़पा करते थे
कभी मश्गुल हम तो कभी मेहरबान हो ही जाया करते थे
सच हम तुम इक दोस्ती के डोर मे कुछ ऐसे बन्धे थे
इक खिचो तो दूसरे को नज्दीक पाते थे
फ़िर वक्त बदला ही क्यू हम तुम जुदा जुदा ही खुश रहते
अगर दर्द होता तुम्हे तो कभी हम भी तो मनाया करते थे
तुम जब भी आते सामने हम सब भुल के मुस्काते थे
खैर दिल्लगी के मौसम शायद बीत गये
हमे भी देखनी नफरतो के मिजाज तेरे
हर वो  अन्दाज जिस्पे कभी हम दिल लगाया करते थे
धीरे धीरे हम भी टूटेगे जितना कभी जोडे थे खुद को तुझसे

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