रविवार, 26 अप्रैल 2015

चर्चे

लिखती रही तेरे ही चर्चे अपनी कहानियों मे…
ढूढती रही खुद को तेरी ही परछाइयों मे…
कुछ अनकही बातो का बोझ लिये दिल मे…
कुछ तेरे मेरे सपने…
जो टूट गये कुछ जो जुडे थे संग अपने…
दर बदर भटके ना जाने कितने दर पे…
सुकुन आता नही जो इस बेचैनि से छूटकारा मिले..…
भूलना चाहती खुद को भी अब क्या रहा अपना जिसका सहारा रहे…
मन की मर्जियो मे तबाह सारी उमर हम रहे…
जो बित गये जो छुट गये हम ही क्यू तबाह उनके पीछे होते रहे…
आज़ाद हू दिल से जिनके उनके खवाब क्यू गुलाम बना रखे…
तकदिरो मे जब जुदाइ लिखी क्यू हम मिलने की कोशिशे करते रहे…
तेरे बाद बस इतनी इल्तेजा हम पतथर बनके यहा रहे…
ना सुने ना कहे ना एहसास कोई हमे छू भी ना सके…
मिट ना जाये वजुद जब्तक बस दुर मुझसे जुडा मेरा हर किस्सा रहे…

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

नफरतो के मौसम

बहुत देखे हम तुम संग मौसम दोस्ती के
इक इक पल मे थे कभी सदिया जीते
तेरे आते ही लब भी बोल पडते थे
गुनगुनाते थे हर मौसम रंग लिये चाहतो के
फूलो सी महक थी अपनी हसि ठ्हाको की बाग मे जब गुंजा करते थे
नाजुक थी फूलो सी इतनी जब गिला इक दूसरे का करते थे
टूट जाती थी मनमानी हम अपनी जब करते थे
मौसम बदलते ही बर्फ सी पिघला करते थे
जिद मे अपने ना जाने कितना हम तड़पा करते थे
कभी मश्गुल हम तो कभी मेहरबान हो ही जाया करते थे
सच हम तुम इक दोस्ती के डोर मे कुछ ऐसे बन्धे थे
इक खिचो तो दूसरे को नज्दीक पाते थे
फ़िर वक्त बदला ही क्यू हम तुम जुदा जुदा ही खुश रहते
अगर दर्द होता तुम्हे तो कभी हम भी तो मनाया करते थे
तुम जब भी आते सामने हम सब भुल के मुस्काते थे
खैर दिल्लगी के मौसम शायद बीत गये
हमे भी देखनी नफरतो के मिजाज तेरे
हर वो  अन्दाज जिस्पे कभी हम दिल लगाया करते थे
धीरे धीरे हम भी टूटेगे जितना कभी जोडे थे खुद को तुझसे

घर

तिनका तिनका लाके कभी था घर हमने भी बनाया
इक हवा के जोर से थोडा दिल था घबराया
फ़िर भी दिल को एतेबार था संग सदा रहेगा अपनो का हमपे साया
मौसम की खुमारी क्या बदली बिखरा हुआ जरा जरा हमने पाया
कुछ थे इतने टूटे की हाथो से हमने समेट नही पाया
दर्द भी थे इतने की अश्को से ही हमने कुछ बहा डाला
आशिया बनाते बनाते हमने खुद को बेघर बना डाला
दीवारो सी उंची अमानते थी वो भी हमने चंद लम्हो मे गवाया
आज खाक होके खुद को राख सा हमने पाया
सुलग रहा किस चिंगारी से धुआ धुआ मिलो फैला हमने पाया
कब्तलक बुझेगी ये आग जिसमे जला मेरा जाहां

तकलीफ़

कितनी तकलीफ़ से गुजरती है मेरी रातें...
क्या बताऊ अंजान लगती है खुद की ही सान्से..
मजबूर दिल ग़मगिन नैना और सिसकति रातें
कुछ तो अश्क बहा ले जाते और कुछ अनकही बातें
बिन तुम्हारे कुछ बदला नही रह गयी थी जो संग मेरे बस तेरी यादे..
खामोशी है चारो तरफ़ अपने कोइ शोर नही यहा होते..
कुछ टूट गये कुछ रुठ गये खत्म हुये सारे रिश्ते नाते..
तन्हा अभी सफ़र चलना बाकी है बिन तेरे
बहुत देखे हमने अबतक दुनिया के मेले
अगर थकन जिन्द्गी की पल दो चार मान्गे
कहनी होगी मुझे तुझसे तो हमने मौत मान्गी है
पल दो पल नही मेरी तो सारी जहां तेरी है
इन्तेजार खतम हुई अपनी अब तो सान्सो का आना जाना ही बाकी है
जब भी जरुरत हो आवाज़ तो लगाना तेरे कदमो मे अपनी जान रख दी है

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

मेरी अर्जी

ओ मेरे मालिक तेरी मरज़ी के आगे मेरी अर्जी क्यू झूठी है
तू सुनता क्यू नही तेरी बेरहमी के आगे मेरी फरियादे छोटी है..
तेरा नाम इतना बडा फिर क्यू तेरी रहमत छोटी है
मुझे टुकडो मे तोड़कर कैसी तेरी खुदाइ है
देख कभी यहा पल पल जिन्द्गी मर रही है
खामोश तु जबसे है तेरे दर पे रोती रही मेरी मुकदर है
कुछ फरियादे तो कुछ शिक्वे ना जाने कबसे लिये सब खडे है
गुजारिश मेरी इतनी नैनो मे कोई खवाब पल ना पाये जब्तक सांसो का आना जाना बाकी है

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

वहम

वहम हो गया था इस दिल को तेरी दोस्ती का..
तेरे संग तेरे लिये कभी जीने का..
खबर ना थी कोई होता नही यहां किसी का..
हर इक लम्हे दर्द देने लगे जिसे समझी कभी पल चाहतों का..
क्या थी तेरी खवाइश मुझे तु इतना ही बता देता..
आरजू तेरी पुरी होती अगर मौत भी तू मांग बैठता..
कशमकश मे दिल तो आज तेरी चाहत मे न उलझा होता..
भूलना शायद मुमकिन हो न हो तेरे संग बिताये उन लम्हो का..
इतना खुद्गर्ज दिल देख के बरस रहे मेरे नैना..
धुल जाये काश वो यादें भी जो तड़पा रहे दिल को बेपनाह..
जो थे इन्तेजार किसी के दिदार के नैनो को खतम हुये यहां..
हर वहम मिट गया मेरे मिट जाने के बाद..
कोई तकलीफ़ न होगी तुझे हम नही आयेगे तेरे राहो मे आज के बाद..
खुशी तुझे मुबारक ग़म से हम रहेगे आबाद..

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

कोशिश

तेरे लफ्ज कितने दर्द समेटे मुझे छू जाते है..
कभी तेरी खमोशी मे खुद को हम सुन पाते है..
दुआ अगर कुबुल होती तो हम तेरी खुशी मांगते है..
तेरी अधूरी मुह्बत की गुनहगारो मे हम  तुम्हे नजर आते है..
महफुज तुम्हे रखने की खातिर ही ये गुनाह हम रोज कर जाते है..
जब जब तेरे लफ्जो मे अपना नाम सुनते है
यकिन नही होता आज भी बारिश हमपे  बरसते है,
रुख्सत तुमसे मिलती क्यू नही हर रात सवालो मे गुजारा करते है..
तुमसे मिलके खुद को पाये थे कभी आज खुद को खोया पाया करते है..
जब भी तुम्हे देखती हू हम सवर जाया करते है..
कैसा है एहसास तुमसे मिलके  तो हम तुमको भी भुल जाया करते है..
कोशिश रोज हम खुद को मिटाने की किया करते है..
तुम्हे देखते ही फिर इक नयी जिन्द्गी हम जी लेते है..