रविवार, 21 दिसंबर 2014

भूल

तुम भुल जाओ तेरा दिल जो अगर चाहे
हम तुम्हे भुला दे कोई पल न आये
हुई गलतफहमी मे जो उसकी सजा न दे
तुझपे जो लुटाया कभी ये भी याद कर ले
गुनाहो की तकलीफ़ मुझे ज्यादा तुझसे
तेरे नम आंखो से पहले हम मर जाये
अगर तू इसे मेरे लिये भिगांये
कैसे बताउ तुझे तेरे हर तकलीफ़ से पहले गुजरना हम चाहे
कुछ समझाना चाहुं तुझे तो इतना समझ ले
तेरे लिये तो हम खुद को भी दुनिया से मिटा ले

बेशक

बेशक तू खफा खफा सा दिखता है..
तेरे नैनो मे मेरा ही ग़म झलकता है..
दिल के आइने मे मेरा ही अक्स रहता है..
इक बात बता मेरे बिना तू तन्हा क्यू जीना चाहता है..
तेरा साथ मुझे हर पल क्यू जरुरी सा लगता है..
नैनो के ख्वाबो का कोई ख्वाब अधूरा सा लगता है..
देखू तुम्हे तो क्यू मुस्कान मेरे चेहरे पे झलकता है ..
समझा ले दिल को तू इतना क्या ये सब बस तुझे बहलाना लगता है..
मुझसे दुर रहना तेरा मुझे बडा खलता है..
मेरे हर सवालो मे तेरा सवाल रहता है..
कुछ नही अगर तेरा मुझसे तू क्यू मेरा तू हिस्सा लगता है..
बेशक तेरे नजरो मे मेरा वजुद झूठा लगता है..
खुद से पुछ ले क्या तेरा क्या मेरा लगता है..
इन्त्जार नैनो का तेरे नैनो का रहता है..

बादल

बादल सा कुछ नसीब लिखा ऊपर वाले ने अपना
कभी भटकना तो कभी बरसना यहा
तेरे अरमान बहुत होंगे मेरे नसीब पे हसने वाले
कभी तो बरसेगी तेरे भी नैनो से बरसाने वाले
इक रात गुजर जाये तेरे घने काली सायों के अन्धेरो के
फिर हम भी देखेंगे इन्साफ़ करने वाले
मेरे ग़म से वास्ता न रहे किसी का ये दुआ हम भी मांगने वाले
वो क्या जुदा करेंगे हम उन्हे खुद मुबारक खुशी के उन्हे करने वाले
मुकद्दर से बैर नही जब अपनो ने ही नजरो मे बैर समझ लिया
अपनी हकिकत पे हमने भी आज किस्सा तमाम कर दिया
लोग क्या कत्ल करेंगे हमने खुद का कत्ल ए आम सरेआम कर दिया..
भटकते रहेंगे तेरे ग़म मे लिखने वाले तेरे दर पे बरसना नैनो ने स्वीकार कर लिया

सुकुन

सुकुन मिला तेरे दर पे आके जो तूने दी जगह तेरी पनाहो मे..
आंखो मे तेरे नमी जो दी हमने नही भुल पाते सारे ग़म भी भुला के..
तेरी यादो मे चुभते है वो मुझे जब भी तेरे संग बिते लम्हे याद आते..
दिल तोड़ के शायद यही सजा मिली तेरे संग होके भी अब हम खुद को जुदा पाते
तेरे लिये ही खुद को भुलाइ थी हमने खुद को आज अपने आपको को हम तुझसे दुर पाते..
उठते है सवाल कितने दिल ही दिल मे जो तुम नही तो हम क्यू खुद को तुझमे पाते..
अजीब सी मुस्किल दुर कर नही सकती तेरी नजरो की नमी खुद मै
तो क्यू रहू तेरे सबसे करीब मै जिसे खुशी देना नसीब था अपना..
उसे तोड़कर खुद को टूटा हुआ हम पाते..

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

आरजु

इक ही आरजू तेरी मुझे है
क्यू खफा कर दी खुद से तुम्हे
मिल न रही सवालो मे उल्झी जिन्द्गी कबसे
निंद पलको पे आई न तुम रुठ गये जबसे
बोझ दिल पे तेरे गमो का लिये डुबी हू सोच मे कबसे..
वफा इतनी न निभा सकी मुहबत तो बेपनाह आज भी तुमसे..
यकिन खुद से उठ गया तुझे समझ के भी मै ही न समझ सकी दिल से
गिला मुझे खुद के कभी होने से
जिस से खुशी मान्गती रही उसे ही ग़म दे दी ज्यादा सबसे
मेरे संग तेरा साथ नही कैसे बढाउं कदम जुदा होके तुझसे
बहुत है ग़म तेरे सिवा भी क्यू बिना तेरे गवारा नही जिन्दगी मुझे
जानती हू मेरे ख्वाब हो तुम
फिर भी मुमकिन नही हकिकत कोई बगैर तुझसे
तुम ही तुम हो ख्यालों मे मेरे ज्यादा सबसे

दर्द

तुझे भुल के सांस भी ना शायद आयेगी..
तुम्हे चाह के इस कदर चाहत मेरी पूरी  हुई..
कैसे भुल के इल्जाम लगाया तुमने..
मुझे ही शायद न आई साथ निभाने..
तेरे ग़म मे खुद से हो गयी है नफ़रत..
कैसे जिउन्गी लेके तेरी उल्फत..
खता मेरी इतनी है गलतफहमी मे जो हुई है..
तुम भुल नही सकते उसे और मै भुल नही सकती तुम्हे..
क्या करू तुमसे मिलने की गुजारिश या रूसवाइ तेरी याद रखू..
दिल मजबूर है तेरे आगे और और मै अपनी गुनाहो के आगे..
सच बहुत तकलीफ़ है इस मुहब्बत मे..
दोस्ती पे इतना था गुमान अपने..
हमने सोचा ही नही दर्द भी कभी देंगे तुम्हे इतने..
अब जो दी है उसे देख नही सकती..
तुम्हे खुद से जुदा भी कर नही सकती..
नही पता क्या हल है इस मुस्किल का..
बस सहा न जा रहा दर्द इन दर्द भरे लम्हो का..

रूसवाइ

रुसवा वो कुछ इस कदर हुए है मुझसे..
खतम कर दिये है सिलसिले हर गुफ्त्गू के..
परवाह नही मेरी अब उन्हे जैसे हम कभी न थे उनके..
नफ़रत हुई कुछ ऐसी की अब राते गुजरते करवटे बदल के..
लफ्ज इतने सख्त है कि मानो खुद सुन न पाते कहने से पहले..
समझ सकती हू तकलीफ़ उनके दिल के..
शिकवा नही मुझे उनके लफ्जो के..
बस शिकायत उनके नजरो के नजरअन्दाजो से..
इतनी भी तकलीफ़ उन्हे अब न दे सकती..
दिल के दर्द भले कम न कर सकू नैनो मे नमी कभी न आने देंगे..
नजरो से इस कदर खुद को दुर हम कर देंगे..
कभी न होगी इसकी अब जरुरत आपको
हमे देख के तुम्हारा दिल तड़पे..
तुम ही तुम हो मेरी नजरो मे तो क्या
खुद को तेरी नजरो से ओझल हम कर देंगे..
तेरी रुसवाइ को भी काश हम दूर कभी कर पाते..
मुझे भूल के काश तुम मुस्कुराते..
और हम अपनी दुआओ मे तुम्हारी खुशी मान्गते..

आहिस्ता आहिस्ता

आहिस्ता आहिस्ता दिल तुझसे दुर हो रहा
कुछ अंदर ही अंदर टूट रहा
तेरा ग़म तो पहले भी था फिर आज क्यू
दिल इतना रो रहा
सब कुछ तो पहले ही खोया था क्यू
आज ये बेचैन कर रहा है
मन इतना क्यू ख्वाइश कर रहा
जब कोई अपना छूट रहा है
मुझे बेशक उसने खुद मे शामिल किया नही
फिर क्यू उस से अपना वजुद जुडा लग रहा है
किस बात की सजा ली हमने भी
जब अपनी ही किस्मत मे लिखी न खुशी
फिर क्यू रोने से शिकवा दिल कर रहा है
है नही जो अपना उसे अपना कहने का जिद्द क्यू कर रहा है
बहुत अलग है जमाना मुझसे फिर क्यू खुद को तबाह कर रहा है
मुझे बस इतना बता दे दिल क्या खता मेरी
जो आज खामोश तू मुझे गुनहगार समझ रहा है
मेरी तन्हाइ को भी क्यू तू रुसवा कर रहा है
मिटना अगर नसीब मे न लिखा होता
तो तू अपना नाम क्यू मुझसे अलग कर रहा है

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

खबर

खबर ना लगी कब तेरा साथ मेरे दामन से छूट गया
कब बेखबर तु मुझसे इस कदर रूठ गया
क्या कहकर मनाऊ तुझे दिल तुझसे हार गया
रो रो के आन्शू भी सुख गये दर्द कुछ इस कदर हुआ
लौट भी आओ अखिरी है तुझसे चाहत मेरी देखो सब कुछ लुट गया
राह मुश्किल है अब गिर गयी हू तो एक बार सम्भाल लो शायद कुछ मुझे हो गया
तेरे नाम से नजरे उठी तु क्यू नजरो से मेरे छिप गया
आस तेरी ही अब इक बार तो मान जाओ कि तेरे बिना सब रूठ गया
ऐ बेखबर खबर तो दे क्यू है खामोश क्या तेरे दर पे आना मना हो गया
सुन तो ले दिल की गुजारीश तेरे बिना मेरा कुछ न रहा

रविवार, 14 दिसंबर 2014

Sukun

तुझसे जुदा होके मुझे सुकुन न मिलेगा
तुझे रुलाके खुशी का कोई एहसास न होगा
मेरे गलती की सज़ा इतनी न दो
तेरा ग़म मुझे कभी जीने न देगा
क्या कहू  तुझे मेरे दर्द का वो लम्हा
जिसे सुन ने वाले भी कोई नही
बेशक चले जाओ जो मेरा हो नही
उसकी क्या खवाइश करू
तेरे होके भी  तेरी नही
खता मेरी इतनी सी तुझसे ही सब कुछ छुपाती रही
काश तुम समझ सकते क्या है हालत अब मेरी
माना हजारो शिकवे मेरे खातिर दिल मे तेरे
यकिन काश कर लेते तुम टूट गयी हू आज ईस हाल मे देख के मै तुझे
अब जिउंगी तेरे ही खवाइशो तले
माफ कर भी दो नही होगी कोई गुस्ताखी दिल से मेरे

एक सच

एक सच तेरी मुहब्बत मुझे प्यारी लगी
संग तेरे ही शायद दुनिया हसिन लगी
सब कुछ जिसे देना था उसे ही कुछ दे ना सकी
गुमान था मुझसे ज्यादा कोई तेरा नही
आज यकिन मुझे हुआ गलतफहमी थी मेरी
तेरी राहों का कांटा मै ही थी
मुझसे ज्खम ज्यादा तुम्हे मिले
जिसने खवबो मे भी दर्द मुझे न दिये कभी
क्या सजा दुं तेरी वफाओ का खुद को
इक इक पल बेचैन जो तुम मेरी वजह से रहे
अब तक सोचती रही तेरी जिन्द्गी मे मै कुछ नही
आज मालूम हुआ मै खुद को भी खो दी हमने तेरे   संग किये गुनाहो मे कही
कैसे कटेगी जिन्द्गी बिन तेरे मेरी
आइना थे तुम खुद को जहा हम देख लिया करते थे कभी
अब तुम्हे देखकर आयेगे नैनो म बस पानी ही  पानी
रंग बेरंग हुए जिसे ढूढ के दिया था तोहफ़ा खुदा ने हम खुद ही भुल आये कहीं
बहुत है जालिम मेरे अरमान लगा कैसे भुल गयी जिसे चाहू वो मेरा होगा नही
हो सके तो माफ न करना मुझे क्युकि अब दिल से न होगी दिल्लगी कभी
बस इतना करना मेरे लिये उस खुदा से दुआ मे मौत मांग लेना कभी
सचे दिल से मान्गी दुआ पुरी होती

खामोश

टूटा कुछ ऐसा जिसे जोड़ ना पाउंगी
दर्द कितने भी हो शिकवा ना कभी तुझसे करूगी
है मुहबत ए सजा गुनाहो की तो एक लफ्ज ना निकालुगी
खमोशी मे चाहे घुट के ना मर जाउंगी
उठ रहे कितने सवाल क्या सच गिर गयी है मेरी नजरे उनके काबिल मै नही
तो दिल की रजांमन्दि क्यू उनके संग कोई साथ आज मेरे क्यू नही
मै और साया भी क्यू लग रहे जुदा जुदा
कोई नही है तो मौत भी हुई पराइ
आज इस जाहां मे मै ही मेरे लिये
लिखनेवाले तेरे वजुद मे यकिन नही होता मुझे कभी
किस कदर लिखावट तेरी मेरे हिस्से मे ही लिखि नैनो की सारी नमी
इक भी मुस्कुराहट लिखी तो संग बद्किस्मिति भी मेरी
जिसे समेटना चाहुं वही बिखेर गया मुझे
जिसे मुकद्दर समझ के जी रही वही मुह मोड़ लिया
बडि खामोश है लफ्ज भी लिखने को अल्फाज मिलते नही
रुकी सी धड़कनो मे सान्सों का आना जाना बस यही
लिखी थी जो भी हमने अन्सुओं के संग बह चली
खामोशि से ही राहे गुजारनी अपनी

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

बेशक मै तुझमे शामिल नही
मुझसे दुर रहकर तुझे भी कुछ होगा हासिल नही
यकिन है मुझे भी अपने से ज्यादा तुझपे
उमर नही गुजारी हमने युही तेरे पनाहो मे
जो जिद्द कर ही ली तो कर के देख लो
आइने मे मुझे देख सवाल न करना
मेरे न होने पे एतेराज न करना
जो फैसला तुमने लिया है उसपे कभी अफ़सोस न करना
मै न रहुगी ना ये पल
तो तन्हाइ मै खुद को अकेला न कर लेना
मुझे तो आदत सी हो गयी तुम तो नये हो अभी आवाज सुनसान राहो मे ना देना
कोई न होगा तुम्हारी सिस्कियो के अलावा
लौटना भी ना तुम्हे शायद मुमकिन होगा
समेट रही खुद का आशिया तो
आज वो फ़िर पुराना बसेरा याद आ रहा
तुम्हे दुआ करूगी न मिले ये विराने
जिसमे हम अपनी खुशिया सजाने है चले
तुमसे मिलके जो हमने खोया काश वो तुम हमे लौटा देते

इल्जाम

इल्जाम लगाने वाले भी कम नही य्हां..
बेरुखि से तोड़  देते है वो आइना ..
जिसमे कभी उतारा करते थे अक्स अपना..
फूलों से नाजुक लफ्ज मे करते थे मेरे वफ़ा पे कभी गुमान..
मुस्किल तो अब लग रहा मुझे कैसे मै कहू उसे पराया जिसे कभी कहा अपना..
मैने सिखा जो तुम्हारा वो हर हाल मे होगा तुम्हारा सहारा..
खडि हू कबसे वफ़ा करु या मै भी बेवफाइ ..
भूल जाउं या दूर कर दुं ये तेरी रुस्वाइ..
तेरे होके भी तेरी नही ऐसे इल्जाम के क्या दुं मै तुझे सजआय..
जिसने समझा नही उसे क्या मै समझाउं..
इक अखिरी गुजारिश तुझसे खतम करना तो कभी शुरू न करना..
इल्जामो का ये दौर आज तो आज  कभी ना देना फ़िर हमे अवाज..
आज खतम कर ही दो देने न परे फिर कोई नाम तेरे अल्फाज..

Bari hi ada se yakin dilate hai log yahan,
gir n paoge kbhi jo sang tere khade hum yahan..
chubhte hai sawal ab un raston ke kankado se jyada ..
jo the saye banke hum saye wo gum kyu andhero me hai kahan..
mai ruth jau unse ya ruth gya khud mera hi masiha..
janti hu sapne pure nhi hote andhero ke ujalo me jab na bna saki apna aashiya..
aag se v jyada jalan dhadkano me kya kr di aisi mai gunah..
jkham bhi mere dawa bhi mere fir kya andar jo yha bechain kr rha..
silsila jo bhi milne ka mukammal ho n ho humne band kar hi di wo akhiri raah..
sukun mile n mile gira k sambhalne wale se behtar hum gire rhe sada..
behatar hoga tut ke bikhar jaye magar jude n unse kabhi jo khud tukdo me ji rhe yahan..
hum khud ko bhula dete hai kisi ke chaht ko bnane me chahe tut jaye sanso ki dor khud yahan..
bhut achha hua jo tut hi gya bharam ek pal me sadiya ji li humne mano yahan..
tajurba to hua logo ka aage rasta hum dikhayenge unhe agar koi bhul gya..

बिखर गये पल

एक तेरी खवाइश मे टूट गयि मै
कुछ ही पल मे बिखर गयी मै
साथ तेरा हुआ नही तेरे जुदा होने से इक साथी खो दी मै
कितनी दूर हू तुझसे कब तेरे पास ही थी मै
क्या शिकवा करु जब अपनो मे शामिल ही नही मै
मेरे होने का तक्कल्लुफ़ ना उठाया करो तुमसे दूर जा रही मै
मेरे आन्शू तुम्हे दिखते नही अब हम भी दिखे न कभी इस ओर चली मै
तेरे वास्ते ही खुशी थी उसे ही तुम्हे लौटाने चली मै
मुझे कुछ मिला नही तुम्हे कुछ मिले इस कोशिश मे निकल चली मै
मेरे होने का इतना  ग़म तुम्हे तो नही रहना तेरे ग़म मे शामिल मुझे
मै हु जो तो तुमसे दूर तो खुशी हो शायद हासिल तुम्हे
अब कोई शिकायत नही तुझसे क्युकि नही हू तेरे वजुद मे कहीं मै

नादान

नादान था दिल भी कितना जो तुम्हे सब कुछ समझता था..
कभी आशू तो कभी मुस्कुराहट तुम संग बाटा करता था..
तेरे लिये हर पल बेचैन रहता था
उसकी ही सजा मिली तो क्यू नादान समझता नही..
जो किया वो क्यू भुलता नही
कैसे बताउं जो दिखते वो सच होते नही
जिसकी चाहत उसे वो यहां मुमकिन नही
फिर सीख ले तू भी चलना जो मिले वो तेरा नही
सब कुछ खोना और कुछ ही पाना मुकद्दर तेरी
नादान दिल तेरी खवाहिशे ऐसी नैनो मे हरपल नमी रही
अब तो खतम कर खवाबो का कारवा पूरा जो कभी होगा नही

लफज खामोशी के

कोई पढता नही आंखो के वो खामोश लफज
कुछ अनकहि बातों के अन्सुने लफज
गुनगुना लुं तो बन जाये गजल
तो कभी दर्द के लम्हो की कोई पहर
छलकते नैनो मे बसे खवाबो के कहर
सब अनजान है या जान के बन गये अनजान
जिन्हे हम समझे कभी अपना गुमान
आज कोई नही इबादत करता क्यू इतनी सी ही थी उनकी वफा
मुझे गुनाह समझकर भूलने वाले तेरी वफा
चलो हम गिला नही करेंगे एक करम तुझपे इतना करेंगे
तेरे जाने के बाद तुझे खुद में शामिल नही करेंगे
तुझे आजाद हम नजरो से नही दिल से करेंगे
हर शिकायत तेरी अब दूर हम करेंगे..

उल्झने

सब कुछ भूला के अपनाया था जिसे आज वो ही सवाल कर रहा..
जिसे जिन्दगी ने मिलाया था मुझे आज वो ही जुदा हो रहा ..
लकिरों से किस्मत से हमने लिखी नही फिर क्यू कोई मिटाने लगा मुझे..
तकदिर का लिखा कुछ ऐसा जिसे हमने थामा उसने ही गिराया मुझे...
किस उलझन मे है मेरी जिन्द्गी गुजर रही क्या बताउ सब खो के भी रहना है जिन्दा हमे..