शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

आहिस्ता आहिस्ता

आहिस्ता आहिस्ता दिल तुझसे दुर हो रहा
कुछ अंदर ही अंदर टूट रहा
तेरा ग़म तो पहले भी था फिर आज क्यू
दिल इतना रो रहा
सब कुछ तो पहले ही खोया था क्यू
आज ये बेचैन कर रहा है
मन इतना क्यू ख्वाइश कर रहा
जब कोई अपना छूट रहा है
मुझे बेशक उसने खुद मे शामिल किया नही
फिर क्यू उस से अपना वजुद जुडा लग रहा है
किस बात की सजा ली हमने भी
जब अपनी ही किस्मत मे लिखी न खुशी
फिर क्यू रोने से शिकवा दिल कर रहा है
है नही जो अपना उसे अपना कहने का जिद्द क्यू कर रहा है
बहुत अलग है जमाना मुझसे फिर क्यू खुद को तबाह कर रहा है
मुझे बस इतना बता दे दिल क्या खता मेरी
जो आज खामोश तू मुझे गुनहगार समझ रहा है
मेरी तन्हाइ को भी क्यू तू रुसवा कर रहा है
मिटना अगर नसीब मे न लिखा होता
तो तू अपना नाम क्यू मुझसे अलग कर रहा है

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