शनिवार, 13 दिसंबर 2014

लफज खामोशी के

कोई पढता नही आंखो के वो खामोश लफज
कुछ अनकहि बातों के अन्सुने लफज
गुनगुना लुं तो बन जाये गजल
तो कभी दर्द के लम्हो की कोई पहर
छलकते नैनो मे बसे खवाबो के कहर
सब अनजान है या जान के बन गये अनजान
जिन्हे हम समझे कभी अपना गुमान
आज कोई नही इबादत करता क्यू इतनी सी ही थी उनकी वफा
मुझे गुनाह समझकर भूलने वाले तेरी वफा
चलो हम गिला नही करेंगे एक करम तुझपे इतना करेंगे
तेरे जाने के बाद तुझे खुद में शामिल नही करेंगे
तुझे आजाद हम नजरो से नही दिल से करेंगे
हर शिकायत तेरी अब दूर हम करेंगे..

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