कोई पढता नही आंखो के वो खामोश लफज
कुछ अनकहि बातों के अन्सुने लफज
गुनगुना लुं तो बन जाये गजल
तो कभी दर्द के लम्हो की कोई पहर
छलकते नैनो मे बसे खवाबो के कहर
सब अनजान है या जान के बन गये अनजान
जिन्हे हम समझे कभी अपना गुमान
आज कोई नही इबादत करता क्यू इतनी सी ही थी उनकी वफा
मुझे गुनाह समझकर भूलने वाले तेरी वफा
चलो हम गिला नही करेंगे एक करम तुझपे इतना करेंगे
तेरे जाने के बाद तुझे खुद में शामिल नही करेंगे
तुझे आजाद हम नजरो से नही दिल से करेंगे
हर शिकायत तेरी अब दूर हम करेंगे..
Hi!Friends i am writing myself...This is my first blog and sharing with you my feelings... Hope you'll like it..!i!i!__N@IN@__!i!i!
शनिवार, 13 दिसंबर 2014
लफज खामोशी के
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें