रविवार, 21 दिसंबर 2014

बादल

बादल सा कुछ नसीब लिखा ऊपर वाले ने अपना
कभी भटकना तो कभी बरसना यहा
तेरे अरमान बहुत होंगे मेरे नसीब पे हसने वाले
कभी तो बरसेगी तेरे भी नैनो से बरसाने वाले
इक रात गुजर जाये तेरे घने काली सायों के अन्धेरो के
फिर हम भी देखेंगे इन्साफ़ करने वाले
मेरे ग़म से वास्ता न रहे किसी का ये दुआ हम भी मांगने वाले
वो क्या जुदा करेंगे हम उन्हे खुद मुबारक खुशी के उन्हे करने वाले
मुकद्दर से बैर नही जब अपनो ने ही नजरो मे बैर समझ लिया
अपनी हकिकत पे हमने भी आज किस्सा तमाम कर दिया
लोग क्या कत्ल करेंगे हमने खुद का कत्ल ए आम सरेआम कर दिया..
भटकते रहेंगे तेरे ग़म मे लिखने वाले तेरे दर पे बरसना नैनो ने स्वीकार कर लिया

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