शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

रूसवाइ

रुसवा वो कुछ इस कदर हुए है मुझसे..
खतम कर दिये है सिलसिले हर गुफ्त्गू के..
परवाह नही मेरी अब उन्हे जैसे हम कभी न थे उनके..
नफ़रत हुई कुछ ऐसी की अब राते गुजरते करवटे बदल के..
लफ्ज इतने सख्त है कि मानो खुद सुन न पाते कहने से पहले..
समझ सकती हू तकलीफ़ उनके दिल के..
शिकवा नही मुझे उनके लफ्जो के..
बस शिकायत उनके नजरो के नजरअन्दाजो से..
इतनी भी तकलीफ़ उन्हे अब न दे सकती..
दिल के दर्द भले कम न कर सकू नैनो मे नमी कभी न आने देंगे..
नजरो से इस कदर खुद को दुर हम कर देंगे..
कभी न होगी इसकी अब जरुरत आपको
हमे देख के तुम्हारा दिल तड़पे..
तुम ही तुम हो मेरी नजरो मे तो क्या
खुद को तेरी नजरो से ओझल हम कर देंगे..
तेरी रुसवाइ को भी काश हम दूर कभी कर पाते..
मुझे भूल के काश तुम मुस्कुराते..
और हम अपनी दुआओ मे तुम्हारी खुशी मान्गते..

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें