रविवार, 14 दिसंबर 2014

एक सच

एक सच तेरी मुहब्बत मुझे प्यारी लगी
संग तेरे ही शायद दुनिया हसिन लगी
सब कुछ जिसे देना था उसे ही कुछ दे ना सकी
गुमान था मुझसे ज्यादा कोई तेरा नही
आज यकिन मुझे हुआ गलतफहमी थी मेरी
तेरी राहों का कांटा मै ही थी
मुझसे ज्खम ज्यादा तुम्हे मिले
जिसने खवबो मे भी दर्द मुझे न दिये कभी
क्या सजा दुं तेरी वफाओ का खुद को
इक इक पल बेचैन जो तुम मेरी वजह से रहे
अब तक सोचती रही तेरी जिन्द्गी मे मै कुछ नही
आज मालूम हुआ मै खुद को भी खो दी हमने तेरे   संग किये गुनाहो मे कही
कैसे कटेगी जिन्द्गी बिन तेरे मेरी
आइना थे तुम खुद को जहा हम देख लिया करते थे कभी
अब तुम्हे देखकर आयेगे नैनो म बस पानी ही  पानी
रंग बेरंग हुए जिसे ढूढ के दिया था तोहफ़ा खुदा ने हम खुद ही भुल आये कहीं
बहुत है जालिम मेरे अरमान लगा कैसे भुल गयी जिसे चाहू वो मेरा होगा नही
हो सके तो माफ न करना मुझे क्युकि अब दिल से न होगी दिल्लगी कभी
बस इतना करना मेरे लिये उस खुदा से दुआ मे मौत मांग लेना कभी
सचे दिल से मान्गी दुआ पुरी होती

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