रविवार, 14 दिसंबर 2014

खामोश

टूटा कुछ ऐसा जिसे जोड़ ना पाउंगी
दर्द कितने भी हो शिकवा ना कभी तुझसे करूगी
है मुहबत ए सजा गुनाहो की तो एक लफ्ज ना निकालुगी
खमोशी मे चाहे घुट के ना मर जाउंगी
उठ रहे कितने सवाल क्या सच गिर गयी है मेरी नजरे उनके काबिल मै नही
तो दिल की रजांमन्दि क्यू उनके संग कोई साथ आज मेरे क्यू नही
मै और साया भी क्यू लग रहे जुदा जुदा
कोई नही है तो मौत भी हुई पराइ
आज इस जाहां मे मै ही मेरे लिये
लिखनेवाले तेरे वजुद मे यकिन नही होता मुझे कभी
किस कदर लिखावट तेरी मेरे हिस्से मे ही लिखि नैनो की सारी नमी
इक भी मुस्कुराहट लिखी तो संग बद्किस्मिति भी मेरी
जिसे समेटना चाहुं वही बिखेर गया मुझे
जिसे मुकद्दर समझ के जी रही वही मुह मोड़ लिया
बडि खामोश है लफ्ज भी लिखने को अल्फाज मिलते नही
रुकी सी धड़कनो मे सान्सों का आना जाना बस यही
लिखी थी जो भी हमने अन्सुओं के संग बह चली
खामोशि से ही राहे गुजारनी अपनी

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