शनिवार, 13 दिसंबर 2014

इल्जाम

इल्जाम लगाने वाले भी कम नही य्हां..
बेरुखि से तोड़  देते है वो आइना ..
जिसमे कभी उतारा करते थे अक्स अपना..
फूलों से नाजुक लफ्ज मे करते थे मेरे वफ़ा पे कभी गुमान..
मुस्किल तो अब लग रहा मुझे कैसे मै कहू उसे पराया जिसे कभी कहा अपना..
मैने सिखा जो तुम्हारा वो हर हाल मे होगा तुम्हारा सहारा..
खडि हू कबसे वफ़ा करु या मै भी बेवफाइ ..
भूल जाउं या दूर कर दुं ये तेरी रुस्वाइ..
तेरे होके भी तेरी नही ऐसे इल्जाम के क्या दुं मै तुझे सजआय..
जिसने समझा नही उसे क्या मै समझाउं..
इक अखिरी गुजारिश तुझसे खतम करना तो कभी शुरू न करना..
इल्जामो का ये दौर आज तो आज  कभी ना देना फ़िर हमे अवाज..
आज खतम कर ही दो देने न परे फिर कोई नाम तेरे अल्फाज..

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