इक ही आरजू तेरी मुझे है
क्यू खफा कर दी खुद से तुम्हे
मिल न रही सवालो मे उल्झी जिन्द्गी कबसे
निंद पलको पे आई न तुम रुठ गये जबसे
बोझ दिल पे तेरे गमो का लिये डुबी हू सोच मे कबसे..
वफा इतनी न निभा सकी मुहबत तो बेपनाह आज भी तुमसे..
यकिन खुद से उठ गया तुझे समझ के भी मै ही न समझ सकी दिल से
गिला मुझे खुद के कभी होने से
जिस से खुशी मान्गती रही उसे ही ग़म दे दी ज्यादा सबसे
मेरे संग तेरा साथ नही कैसे बढाउं कदम जुदा होके तुझसे
बहुत है ग़म तेरे सिवा भी क्यू बिना तेरे गवारा नही जिन्दगी मुझे
जानती हू मेरे ख्वाब हो तुम
फिर भी मुमकिन नही हकिकत कोई बगैर तुझसे
तुम ही तुम हो ख्यालों मे मेरे ज्यादा सबसे
Hi!Friends i am writing myself...This is my first blog and sharing with you my feelings... Hope you'll like it..!i!i!__N@IN@__!i!i!
शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014
आरजु
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