रविवार, 21 दिसंबर 2014

सुकुन

सुकुन मिला तेरे दर पे आके जो तूने दी जगह तेरी पनाहो मे..
आंखो मे तेरे नमी जो दी हमने नही भुल पाते सारे ग़म भी भुला के..
तेरी यादो मे चुभते है वो मुझे जब भी तेरे संग बिते लम्हे याद आते..
दिल तोड़ के शायद यही सजा मिली तेरे संग होके भी अब हम खुद को जुदा पाते
तेरे लिये ही खुद को भुलाइ थी हमने खुद को आज अपने आपको को हम तुझसे दुर पाते..
उठते है सवाल कितने दिल ही दिल मे जो तुम नही तो हम क्यू खुद को तुझमे पाते..
अजीब सी मुस्किल दुर कर नही सकती तेरी नजरो की नमी खुद मै
तो क्यू रहू तेरे सबसे करीब मै जिसे खुशी देना नसीब था अपना..
उसे तोड़कर खुद को टूटा हुआ हम पाते..

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