शनिवार, 13 दिसंबर 2014

उल्झने

सब कुछ भूला के अपनाया था जिसे आज वो ही सवाल कर रहा..
जिसे जिन्दगी ने मिलाया था मुझे आज वो ही जुदा हो रहा ..
लकिरों से किस्मत से हमने लिखी नही फिर क्यू कोई मिटाने लगा मुझे..
तकदिर का लिखा कुछ ऐसा जिसे हमने थामा उसने ही गिराया मुझे...
किस उलझन मे है मेरी जिन्द्गी गुजर रही क्या बताउ सब खो के भी रहना है जिन्दा हमे..

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